देहरादून, 1 मार्च 2026: केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रविवार को देहरादून स्थित भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान (ICAR-IISWC) का दौरा किया। इस अवसर पर उन्होंने स्पष्ट किया कि मृदा स्वास्थ्य और जल संसाधनों का संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय जन आंदोलन होना चाहिए।
विकसित भारत 2047 का आधार है कृषि सुरक्षा
संस्थान में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश की कृषि का भविष्य पूरी तरह से मिट्टी और पानी की गुणवत्ता पर टिका है। उन्होंने इस अभियान को ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्यों से जोड़ते हुए कहा कि जब तक ग्रामीण स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण नहीं होगा, तब तक आत्मनिर्भर भारत का सपना पूरा नहीं हो सकता।
ग्राम स्तर पर कार्ययोजना बनाने के निर्देश
चौहान ने संस्थान के वैज्ञानिकों और अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे मृदा एवं जल संरक्षण की तकनीकों को प्रयोगशालाओं से निकालकर सीधे गाँवों तक पहुँचाएँ। उन्होंने इसके लिए निम्नलिखित बिंदुओं पर बल दिया:
  • स्पष्ट लक्ष्य और समयबद्ध कार्ययोजना: ग्राम स्तर पर संरक्षण तकनीकों के विस्तार के लिए ठोस रोडमैप तैयार किया जाए।
  • जनभागीदारी: किसानों, स्थानीय समुदायों और स्वयंसेवी संगठनों (NGOs) को इस अभियान से सक्रिय रूप से जोड़ा जाए।
  • तकनीकी नवाचार: मृदा अपरदन को रोकने और बंजर भूमि के पुनर्वास के लिए वैज्ञानिक तकनीकों का अधिकतम उपयोग हो।
किसानों ने साझा किए अपने अनुभव
भ्रमण के दौरान केंद्रीय मंत्री ने संस्थान से जुड़े प्रगतिशील किसानों से भी बातचीत की। किसानों ने बताया कि कैसे संस्थान की तकनीकों के माध्यम से उनके क्षेत्रों में मृदा अपरदन में कमी आई है और जल की उपलब्धता बढ़ने से बंजर भूमि फिर से उपजाऊ हो गई है। संस्थान ने इस दौरान नदियों के किनारों के कटाव को रोकने के लिए बांस की नर्सरी और अन्य जैव-अभियांत्रिकी (bio-engineering) उपायों का प्रदर्शन भी किया।
निष्कर्ष:
केंद्रीय मंत्री का यह दौरा उत्तराखंड में एकीकृत खेती और टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। उन्होंने अंत में अपील की कि हर नागरिक को जल और मिट्टी की सुरक्षा को अपना व्यक्तिगत कर्तव्य समझना चाहिए।

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