देहरादून/चंपावत, 5 अक्टूबर 2026। उत्तराखंड सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में 4 अक्टूबर 2026 को चंपावत के बनबसा स्थित एनएचपीसी परिसर में हुई कैबिनेट बैठक में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना से जुड़े भूमि और वित्तीय मानकों में महत्वपूर्ण संशोधन को मंजूरी दी गई। सरकार का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना की प्रक्रिया को अधिक व्यावहारिक बनाना है।
नई व्यवस्था के तहत अब निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए केवल बड़ी मात्रा में एकमुश्त जमीन उपलब्ध होना अनिवार्य नहीं रहेगा। कैबिनेट ने भूमि क्षेत्रफल के बजाय निर्मित क्षेत्र यानी built-up area को प्रमुख आधार बनाने का फैसला किया है। संशोधित मानकों के अनुसार पर्वतीय क्षेत्रों में निजी विश्वविद्यालय के लिए न्यूनतम 2,500 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र और मैदानी क्षेत्रों में न्यूनतम 20,000 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र की आवश्यकता होगी।
इससे पहले पर्वतीय क्षेत्रों में निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए कम से कम 2.5 एकड़ भूमि की आवश्यकता थी। यह जमीन पांच किलोमीटर की परिधि में अधिकतम तीन अलग-अलग स्थानों पर हो सकती थी। वहीं मैदानी क्षेत्रों में निजी विश्वविद्यालय के लिए 10 एकड़ भूमि का प्रावधान था। पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों और जमीन की उपलब्धता को देखते हुए यह शर्त संस्थानों के लिए बड़ी चुनौती मानी जाती थी।
उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में जमीन का एक ही स्थान पर उपलब्ध होना आसान नहीं है। कई क्षेत्रों में पहाड़ी भूगोल, ढलान, छोटे-छोटे भूखंड और अन्य भौगोलिक परिस्थितियां बड़े शिक्षण संस्थानों के लिए पर्याप्त जमीन जुटाने में बाधा बनती हैं। ऐसे में सरकार द्वारा भूमि के बजाय निर्मित क्षेत्र को आधार बनाने के निर्णय से निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के इच्छुक संस्थानों के लिए प्रक्रिया पहले की तुलना में आसान होने की उम्मीद है।
कैबिनेट ने निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना से जुड़ी वित्तीय शर्तों में भी बदलाव को मंजूरी दी है। अमर उजाला के अनुसार, पहले पर्वतीय क्षेत्रों में तीन करोड़ रुपये और मैदानी क्षेत्रों में पांच करोड़ रुपये की स्थायी विन्यास निधि तथा बैंक खाते में निर्धारित राशि रखने जैसी व्यवस्थाएं लागू थीं। नई व्यवस्था में इन वित्तीय मानकों को समाप्त करते हुए प्रोसेसिंग शुल्क की राशि को भी कम किया गया है।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने में पहले भूमि और वित्तीय दोनों तरह की बाधाएं सामने आ रही थीं। सरकार ने इन बाधाओं को कम करने के लिए मानकों में बदलाव किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पहले मैदानी क्षेत्र में निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के लिए 10 एकड़ भूमि की आवश्यकता थी, जबकि अब 20,000 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र को आधार बनाया जाएगा।
गुणवत्ता से समझौता नहीं होगा
सरकार ने केवल नियमों को आसान करने पर जोर नहीं दिया है, बल्कि निजी विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए अलग मूल्यांकन मानक तय करने का भी फैसला किया है। निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने के प्रस्तावों का निर्धारित गुणवत्ता मानकों के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि भूमि और वित्तीय शर्तों में राहत मिलने के बावजूद उच्च शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित न हो।
सरकार के इस निर्णय से उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में उच्च शिक्षा के नए संस्थान स्थापित होने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। यदि निजी विश्वविद्यालय पहाड़ी क्षेत्रों में स्थापित होते हैं तो स्थानीय विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए देहरादून, हल्द्वानी, दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की ओर जाने की आवश्यकता कम हो सकती है।
पहाड़ के युवाओं को स्थानीय स्तर पर मिल सकते हैं नए अवसर
पर्वतीय क्षेत्रों में उच्च शिक्षण संस्थानों का विस्तार होने से विद्यार्थियों को अपने क्षेत्र के नजदीक ही स्नातक, स्नातकोत्तर और विभिन्न व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की सुविधा मिलने की उम्मीद है। इसके साथ ही विश्वविद्यालयों के माध्यम से स्थानीय स्तर पर रोजगार, शिक्षण, प्रशासनिक और अन्य सेवाओं से जुड़े अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में उच्च शिक्षा के संस्थानों की उपलब्धता का संबंध पलायन से भी जोड़ा जाता है। बड़ी संख्या में विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए मैदानी शहरों का रुख करते हैं। सरकार की ओर से नियमों में ढील देकर पहाड़ों में नए संस्थानों को प्रोत्साहन देने से स्थानीय युवाओं को अपने ही क्षेत्र में बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।
कैबिनेट बैठक में 24 प्रस्तावों पर फैसला
यह फैसला मुख्यमंत्री धामी की अध्यक्षता में बनबसा में हुई पहली जिला-स्तरीय कैबिनेट बैठक के दौरान लिया गया। बैठक में कुल 24 महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर निर्णय किया गया। इनमें उच्च शिक्षा, कौशल विकास, भूमि अधिकार, पंतनगर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट, स्वास्थ्य, वित्तीय प्रबंधन और प्रशासनिक सुधार से जुड़े प्रस्ताव शामिल रहे।
इसी बैठक में सरकार ने मुख्यमंत्री उच्च शिक्षा कौशल संवर्धन योजना-2026 को भी मंजूरी दी। इस योजना के तहत लगभग 1.19 लाख विद्यार्थियों को रोजगारपरक और उद्यमिता से जुड़े कौशल उपलब्ध कराने के लिए अगले पांच वर्षों में करीब 200 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का निर्णय लिया गया।
पंतनगर ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट के विस्तार के लिए भी कैबिनेट ने 66.29 करोड़ रुपये की शेष धनराशि जारी करने को मंजूरी दी। इसके अलावा भूमि अधिकार, वन भूमि हस्तांतरण और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े कई अन्य फैसले भी किए गए।
पहाड़ी क्षेत्रों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है फैसला?
उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां मैदानी राज्यों से काफी अलग हैं। पहाड़ों में बड़े भूखंडों को एक जगह उपलब्ध कराना कठिन होता है। यही वजह है कि पहले से निर्धारित भूमि मानक निजी शिक्षण संस्थानों के लिए व्यावहारिक समस्या पैदा कर सकते थे। अब निर्मित क्षेत्र को आधार बनाने से इस समस्या को कम करने का प्रयास किया गया है।
हालांकि, निजी विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ना अपने आप में पर्याप्त नहीं होगा। संस्थानों की शैक्षणिक गुणवत्ता, फीस, स्थानीय छात्रों की पहुंच, रोजगारपरक पाठ्यक्रम, शिक्षक गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाएं भी महत्वपूर्ण होंगी। सरकार द्वारा अलग गुणवत्ता मूल्यांकन व्यवस्था लागू करने का निर्णय इसी दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, धामी कैबिनेट का यह फैसला उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2.5 एकड़ जैसी पुरानी भूमि शर्त की जगह 2,500 वर्गमीटर निर्मित क्षेत्र का प्रावधान पहाड़ों में निजी विश्वविद्यालय स्थापित करने की राह को आसान कर सकता है। साथ ही गुणवत्ता मूल्यांकन की व्यवस्था यह सुनिश्चित करने की कोशिश करेगी कि नियमों में छूट के साथ शिक्षा के स्तर से समझौता न हो।