नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ‘ऑपरेशन रेजपिल’ (Operation Ragepill) के तहत देहरादून में अवैध रूप से संचालित एक दवा फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया है, जहां अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ‘जिहादी ड्रग’ के नाम से कुख्यात ‘कैप्टागन’ (Captagon) टैबलेट का निर्माण किया जा रहा था। केंद्रीय जांच एजेंसी ने इस मामले में सहसपुर क्षेत्र से अवैध फैक्ट्री के मालिक संजय कुमार को गिरफ्तार किया है। इससे पहले दिल्ली के नेब सराय इलाके से एक सीरियाई नागरिक अलाब्रास अहमद को गिरफ्तार किया गया था, जिसकी निशानदेही पर ही इस पूरी फैक्ट्री का पर्दाफाश हुआ।
दिल्ली से शुरू हुई जांच और देहरादून तक पहुंचा नेटवर्क
इस बड़े सिंडिकेट का खुलासा तब हुआ जब सुरक्षा एजेंसियों को एक विदेशी इनपुट मिला कि भारत के रास्ते मध्य-पूर्व (खासकर सऊदी अरब) में अवैध ड्रग्स की बड़ी खेप भेजने की तैयारी की जा रही है। इसके बाद NCB की टीम ने दिल्ली के नेब सराय इलाके में एक घर पर छापा मारा, जहां चपाती कटिंग मशीन के भीतर छिपाकर रखी गई 31.5 किलोग्राम कैप्टागन टैबलेट बरामद हुई।
वहां से गिरफ्तार सीरियाई नागरिक ने पूछताछ में खुलासा किया कि इन टैबलेट्स का निर्माण दिल्ली में नहीं, बल्कि उत्तराखंड के देहरादून स्थित एक फैक्ट्री में किया गया था। इस इनपुट के आधार पर केंद्रीय जांच एजेंसी ने शनिवार, 16 मई 2026 की देर रात देहरादून के सहसपुर स्थित ‘ग्रीन हर्बल’ नाम की फैक्ट्री पर छापेमारी की।
प्रतिदिन 50 हजार रुपये के लालच में देश की सुरक्षा से खिलवाड़
जांच में सामने आया कि गिरफ्तार सीरियाई नागरिक और उसके एक अन्य विदेशी साथी ने देहरादून की इस फैक्ट्री को अवैध ड्रग्स बनाने की लैब में तब्दील कर दिया था। फैक्ट्री के मालिक संजय कुमार ने महज 50,000 रुपये प्रतिदिन के किराए के लालच में अपना पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर इन विदेशी नागरिकों को सौंप दिया था। मालिक ने यह भी जानने की कोशिश नहीं की कि उसकी फैक्ट्री के अंदर किस प्रतिबंधित रसायन का इस्तेमाल किया जा रहा है।
आयुर्वेदिक बोर्ड की आड़ में चल रहा था खतरनाक खेल
NCB अधिकारियों के मुताबिक, छापेमारी के दौरान फैक्ट्री के बाहर आयुर्वेद और हर्बल उत्पादों का बोर्ड लगा पाया गया, ताकि किसी को कोई शक न हो। लेकिन जब टीम अंदर दाखिल हुई, तो वहां का आधुनिक ड्रग सेटअप देखकर अधिकारी दंग रह गए। परिसर से टैबलेट बनाने, ग्रेनुलेशन, कैप्सूल फिलिंग, कोटिंग, सीलिंग और ब्लिस्टर पैकेजिंग करने वाली बेहद परिष्कृत और अत्याधुनिक मशीनें (Sophisticated Machinery) बरामद की गईं।
उत्तराखंड FDA के रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थी फैक्ट्री
इस सनसनीखेज खुलासे के बाद उत्तराखंड खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FDA) के अतिरिक्त आयुक्त ताजबर सिंह जग्गी ने बयान जारी कर स्पष्ट किया कि सहसपुर की यह ‘ग्रीन हर्बल’ फैक्ट्री औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम (Drugs and Cosmetics Act) या FSSAI के तहत पंजीकृत नहीं थी और इसके पास विनिर्माण का कोई वैध लाइसेंस नहीं था। चूंकि यह मामला पूरी तरह से एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम के तहत प्रतिबंधित नशीले पदार्थों से जुड़ा है, इसलिए केंद्रीय एजेंसियां ही इसकी गहन जांच कर रही हैं।
क्या है कैप्टागन या ‘जिहादी ड्रग’?
वरिष्ठ अधिकारियों और चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, कैप्टागन एक अत्यधिक खतरनाक कृत्रिम साइकोट्रोपिक (Synthetic Psychotropic) ड्रग है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे ‘जिहादी ड्रग’ या ‘कैप्टिवेटर ऑफ टेरर’ भी कहा जाता है, क्योंकि आतंकवादी संगठन और वैश्विक ड्रग नेटवर्क युद्ध या संघर्ष क्षेत्रों (Conflict Zones) में इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं। यह ड्रग इंसानी शरीर में जाते ही अत्यधिक ऊर्जा का संचार करता है, नींद और भूख को पूरी तरह गायब कर देता है, डर को खत्म करता है और लंबे समय तक अत्यधिक शारीरिक गतिविधियों को बनाए रखने की क्षमता देता है।
कुल 182 करोड़ रुपये के ड्रग्स की जब्ती
इस पूरे अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट के खिलाफ की गई कार्रवाई में अब तक कुल 227.2 किलोग्राम कैप्टागन (टैबलेट और पाउडर फॉर्म में) जब्त किया जा चुका है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनुमानित कीमत लगभग 182 करोड़ रुपये बताई जा रही है। इसमें से 31.5 किलोग्राम टैबलेट दिल्ली से मिली थी, जबकि 196 किलोग्राम से अधिक का कैप्टागन पाउडर गुजरात के मुंद्रा पोर्ट पर एक कंटेनर से बरामद किया गया था, जिसे भेड़ की ऊन की आड़ में छिपाकर सीरिया से इम्पोर्ट किया गया था।
स्थानीय इंटेलिजेंस और सुरक्षा पर उठे सवाल
जांच में यह भी सामने आया कि गिरफ्तार सीरियाई नागरिक नवंबर 2024 में भारत आया था और जनवरी 2025 में उसका वीजा खत्म होने के बाद भी वह अवैध रूप से देश में छिपा हुआ था। वहीं फैक्ट्री का मालिक संजय कुमार भी पहले से नशीली दवाओं (जैसे ट्रामाडोल) की तस्करी के दो मामलों में बेल पर बाहर चल रहा था। ऐसे में एक हिस्ट्रीशीटर की फैक्ट्री में विदेशी नागरिकों द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर का ड्रग लैब सेटअप कर लेना स्थानीय बीट पुलिसिंग और लोकल इंटेलिजेंस की एक बड़ी नाकामी को दर्शाता है। फिलहाल केंद्रीय जांच एजेंसियां इस मामले में वित्तीय लेन-देन और अन्य फरार आरोपियों की तलाश में जुटी हैं।