एक राष्ट्र, एक शिक्षा की अवधारणा पर बल
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि उनकी सरकार का मुख्य उद्देश्य प्रदेश के सभी बच्चों को बिना किसी भेदभाव के आधुनिक, गुणवत्तापूर्ण और रोजगारपरक शिक्षा उपलब्ध कराना है। उन्होंने कहा कि यह नया अधिनियम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस विज़न को आगे बढ़ाता है, जिसके तहत “अल्पसंख्यक बच्चों के एक हाथ में कुरान (धार्मिक तालीम) हो, तो दूसरे हाथ में कंप्यूटर और आधुनिक विज्ञान की ताकत हो”। सीएम धामी ने भरोसा जताया कि शिक्षा के क्षेत्र में उत्तराखंड का यह नया मॉडल पूरे देश के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण (आदर्श मॉडल) साबित होगा।
नई व्यवस्था के मुख्य बिंदु और बड़े बदलाव
- समान नियम: अब प्रदेश के सभी छह मान्यता प्राप्त अल्पसंख्यक समुदायों—मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी—के शिक्षण संस्थान एक ही प्रशासनिक प्राधिकरण के अधीन संचालित होंगे।
- अनिवार्य पाठ्यक्रम: नए नियमों के तहत सभी मदरसों और अल्पसंख्यक स्कूलों को उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा परिषद (राज्य शिक्षा बोर्ड) से संबद्धता लेनी होगी और वहां अनिवार्य रूप से एनसीईआरटी (NCERT) का आधुनिक पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा।
- धार्मिक शिक्षा की अनुमति: मदरसों में धार्मिक तालीम और अरबी-फारसी की पढ़ाई पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई गई है। छात्र अपनी धार्मिक शिक्षा जारी रख सकेंगे, लेकिन इसे नियमित स्कूल समय (औपचारिक पढ़ाई के घंटों) के बाद अलग से संचालित करना होगा।
- प्रमाण पत्रों को वैध मान्यता: अब तक मदरसा बोर्ड से जारी होने वाली डिग्रियों को राज्य शिक्षा बोर्ड के समकक्ष पूरी तरह मान्यता प्राप्त नहीं थी। अब राज्य बोर्ड का सर्टिफिकेट मिलने से इन छात्रों को उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों में समान अवसर मिल सकेंगे।
- मिड-डे मील (पीएम पोषण योजना) की सख्त शर्तें: सरकार ने साफ किया है कि केवल उन्हीं मदरसों को ‘पीएम पोषण योजना’ (मिड-डे मील) का लाभ मिलेगा, जो शिक्षा विभाग के सभी तय मानकों और इंफ्रास्ट्रक्चर की शर्तों को पूरा करेंगे।
प्राधिकरण का नया प्रशासनिक ढांचा
धामी सरकार ने नवगठित ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ को सुचारू रूप से चलाने के लिए एक मजबूत और निष्पक्ष प्रशासनिक बोर्ड का गठन किया है। इसके तहत:
- अध्यक्ष: वरिष्ठ शिक्षाविद् प्रोफेसर सुरजीत सिंह गांधी को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।
- सदस्य: विभिन्न अल्पसंख्यक समुदायों के प्रबुद्ध विद्वानों और प्रोफेसरों को बोर्ड में जगह दी गई है, जिनमें प्रोफेसर राकेश कुमार जैन, डॉ. सैयद अली हामिद, प्रोफेसर पेमा तेनज़िंग, प्रोफेसर गुरमीत सिंह, डॉ. एल्बा मांद्रेले और प्रोफेसर रॉबिन अमन शामिल हैं।
- पदेन सदस्य: स्कूल शिक्षा के महानिदेशक (DG) और एससीईआरटी (SCERT) के निदेशक को इसका पदेन सदस्य बनाया गया है, जबकि अल्पसंख्यक कल्याण निदेशक पदेन सदस्य सचिव के रूप में जिम्मेदारी संभालेंगे।
मान्यता के लिए कड़े मानक और अब तक की स्थिति
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के लागू होने के बाद राज्य में संचालित सभी 452 पंजीकृत मदरसों और मिशनरी स्कूलों के लिए नई गाइडलाइंस के तहत पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया है।
इस नई व्यवस्था के तहत मान्यता के लिए आवेदन की प्रक्रिया तेजी से चल रही है। वर्तमान रिपोर्ट के अनुसार, कुल 452 पंजीकृत मदरसों में से 158 मदरसों ने शिक्षा विभाग से मान्यता लेने के लिए आवेदन जमा कर दिया है। इनमें से मानकों को पूरा करने वाले शुरुआती 7 मदरसों, एक सिख समुदाय के स्कूल और एक जैन समुदाय के स्कूल को पूर्ण पात्रता मिलने पर मुख्यमंत्री द्वारा खुद मान्यता प्रमाण पत्र सौंपे गए हैं। वहीं, जो संस्थान तय मानकों (जैसे स्वयं की भूमि, पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर और योग्य शिक्षक) को पूरा नहीं करेंगे, उन्हें आगे संचालन की अनुमति नहीं दी जाएगी। इससे पहले भी जांच के दौरान नियमों का उल्लंघन करने वाले करीब 250 से अधिक अवैध मदरसों पर कार्रवाई करते हुए उन्हें बंद किया जा चुका है।
पूर्व मदरसा बोर्ड और समाज का रुख
इस बड़े बदलाव को लेकर जहां कुछ वर्गों में धार्मिक स्वायत्तता को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं, वहीं पूर्व मदरसा बोर्ड के अध्यक्ष शमून कासमी सहित कई मुस्लिम बुद्धिजीवियों और सामाजिक विचारकों ने इस फैसले का खुलकर स्वागत किया है। उनका मानना है कि इस कदम से मदरसों में पढ़ने वाले गरीब और पिछड़े समाज के बच्चों को विज्ञान, गणित, कंप्यूटर और अंग्रेजी जैसे आधुनिक विषयों को पढ़ने का मौका मिलेगा। इससे वे समाज की मुख्यधारा में शामिल होकर देश के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकेंगे।