धर्मशाला/द्वाराहाट: उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के रहने वाले और राष्ट्रीय जल पुरस्कार से सम्मानित

मोहन चंद्र कांडपाल

के जल संरक्षण कार्यों की गूँज अब हिमाचल प्रदेश तक पहुँच गई है। धर्मशाला में आयोजित एक विशेष सम्मेलन में उनके ‘पानी बोओ, पानी उगाओ’ अभियान को विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों द्वारा जमकर सराहा गया।

दलाई लामा के 86वें वर्षगांठ समारोह में हुए शामिल
धर्मशाला में 14वें दलाई लामा की पदवी पर आसीन होने की 86वीं वर्षगांठ के अवसर पर तिब्बत पालिसी इंस्टीट्यूट द्वारा जल संरक्षण पर एक महत्वपूर्ण सम्मेलन आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में मोहन कांडपाल ने अपने व्याख्यान के माध्यम से हिमालयी क्षेत्रों में जल संकट के समाधान पेश किए।

क्या है ‘पानी बोओ, पानी उगाओ’ अभियान?
मोहन कांडपाल ने पहाड़ों में जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के लिए एक अनूठी पद्धति विकसित की है:
  • 5,000 से अधिक तालाब (खाल): उन्होंने जनसहयोग से अब तक हजारों पारंपरिक जल संचयन संरचनाएं बनाई हैं।
  • रिस्क नदी का पुनरुद्धार: उनके प्रयासों से लगभग 40 किमी लंबी रिस्क नदी में फिर से जलधारा बहने लगी है, जिससे 45,000 से अधिक लोगों को फायदा हो रहा है।
  • महिला शक्ति का साथ: उन्होंने 62 से अधिक महिला मंगल दलों को इस मुहिम से जोड़कर 1 लाख से ज्यादा पौधे रोपे हैं।
राष्ट्रपति द्वारा हो चुके हैं सम्मानित
मूल रूप से द्वाराहाट के कांडे गांव के निवासी और आदर्श इंटर कॉलेज सुरइखेत में शिक्षक मोहन कांडपाल को उनके इन्ही कार्यों के लिए नवंबर 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने छठे राष्ट्रीय जल पुरस्कार (उत्तर भारत श्रेणी) से नवाजा था।
धर्मशाला में आयोजित इस सम्मेलन में बुद्धिजीवियों ने माना कि कांडपाल का यह मॉडल बढ़ते जल संकट के दौर में पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक प्रेरणा है।

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