खटीमा (उधम सिंह नगर)
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सोमवार को एक बिल्कुल अलग और बेहद सादगी भरे अंदाज में नजर आए। अपने गृह क्षेत्र खटीमा के नगला तराई स्थित निजी आवास पर पहुंचे मुख्यमंत्री वीआईपी प्रोटोकॉल और राजनीतिक आपाधापी को पीछे छोड़कर अपनी जड़ों की ओर लौटते दिखे। सीएम धामी सुबह अपनी माता बिशना देवी के साथ अपने घरेलू खेतों में पहुंचे। वहां उन्होंने न सिर्फ जमीन पर कदम रखा, बल्कि आम किसान की तरह कड़ी मेहनत की। उन्होंने खुद हाथों में पावर टिलर थामकर खेत की जुताई की, फावड़ा चलाया और जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए टोकरी से गोबर की खाद भी बिखेरी। मुख्यमंत्री का अपनी मां के साथ खेतों में पसीना बहाते हुए यह रूप सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। 
माँ बिशना देवी के साथ सादगी की अनूठी मिसाल
खेतों में काम करने के दौरान मुख्यमंत्री के साथ उनकी माता बिशना देवी भी लगातार मौजूद रहीं। उन्होंने अपनी मां की देखरेख में पारंपरिक कृषि कार्यों को पूरा किया। अपनी मां के साथ खेत के काम में हाथ बंटाने की इस तस्वीर को देखकर स्थानीय लोगों और नेटिजन्स ने उनके इस सादगी भरे रवैये की जमकर सराहना की। खेत की मेड़ पर खड़ी मां का मार्गदर्शन लेते हुए सूबे के मुखिया का यह अंदाज यह संदेश देता है कि व्यक्ति चाहे जितने बड़े पद पर पहुंच जाए, उसे अपनी मातृभूमि, खेती और माता-पिता के आशीर्वाद को कभी नहीं भूलना चाहिए। 
खुद चलाया पावर टिलर और डाला गोबर का खाद 
खेत को आगामी फसल के लिए तैयार करने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री ने आधुनिक कृषि यंत्र पावर टिलर का संचालन खुद किया। उन्होंने काफी देर तक खेत की जुताई की। इसके बाद उन्होंने पारंपरिक तरीके से जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए खेत की मिट्टी में गोबर की प्राकृतिक खाद डाली। इस दौरान उन्होंने मिट्टी की महक और किसान के वास्तविक श्रम को महसूस किया। उन्होंने फावड़ा उठाकर क्यारियों को ठीक करने का काम भी किया। 
किसानों को मुख्यमंत्री का खास संदेश: “खेती हमारी संस्कृति की आत्मा है”
इस दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देश और प्रदेश के किसान भाइयों के नाम एक विशेष और महत्वपूर्ण संदेश जारी किया। उन्होंने कहा कि:
    • आजीविका से बढ़कर है कृषि: खेती केवल पेट भरने या आजीविका चलाने का जरिया नहीं है। यह हमारी भारतीय संस्कृति, परंपरा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली आत्मा है। 
    • पारंपरिक और आधुनिकता का मेल जरूरी: आधुनिक कृषि तकनीकों (जैसे टिलर और ट्रैक्टर) का स्वागत है, लेकिन हमें अपनी पारंपरिक और प्राकृतिक कृषि पद्धतियों को नहीं छोड़ना चाहिए। 
    • केमिकल मुक्त खेती का आह्वान: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर अपनी निर्भरता को कम करना पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए बेहद आवश्यक है।

प्राकृतिक और जैविक कृषि को बताया सबसे टिकाऊ विकल्प
मुख्यमंत्री धामी ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि गोबर की खाद और केंचुआ खाद जैसी प्राकृतिक पद्धतियां भूमि की प्राकृतिक उर्वरता (Soil Fertility) को लंबे समय तक बनाए रखती हैं। रासायनिक खादों के अत्यधिक इस्तेमाल से जमीन बंजर हो रही है। यदि उत्तराखंड को बचाना है और इसे देश का अग्रणी राज्य बनाना है, तो जैविक और प्राकृतिक खेती (Organic and Natural Farming) को ही सबसे मजबूत और टिकाऊ विकल्प के रूप में अपनाना होगा। 
युवा पीढ़ी को खेती से जोड़ने की जरूरत और सरकारी प्रयास 
सीएम धामी ने कहा कि आज उत्तराखंड की मुख्य पहचान इसकी प्रकृति, पहाड़, कृषि और समृद्ध ग्रामीण संस्कृति से है। पलायन को रोकने और पहाड़ों को आबाद रखने के लिए राज्य की युवा पीढ़ी को आधुनिक सोच के साथ कृषि और स्वरोजगार से जोड़ना समय की सबसे बड़ी मांग है। 
उन्होंने भरोसा दिलाया कि उत्तराखंड सरकार किसानों की आय दोगुनी करने, कृषि उत्पादों को बेहतर बाजार (Market Linkage) उपलब्ध कराने और जैविक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कई प्रकार की सब्सिडी व कल्याणकारी योजनाएं चला रही है। मुख्यमंत्री ने सभी से अपील की कि वे अपनी बंजर जमीनों को दोबारा आबाद करें ताकि देवभूमि को आत्मनिर्भर बनाया जा सके।

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