हरिद्वार (उत्तराखंड):
उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार में मानवता की सेवा और जीवन रक्षा को लेकर एक बड़े राष्ट्रीय अभियान का शंखनाद हुआ है। हरिद्वार के शांतिकुंज स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय (DSVV) में शनिवार को ‘दधीचि अंगदान संकल्प अभियान‘ के तहत एक भव्य राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा (जेपी नड्डा) और विशिष्ट अतिथि के रूप में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शिरकत की. कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में उपस्थित हजारों लोगों और युवाओं ने मृत्यु के पश्चात अपने अंगों को दान करने का ऐतिहासिक सामूहिक संकल्प लिया.
उत्तराखंड की धर्मनगरी हरिद्वार में मानवता की सेवा और जीवन रक्षा को लेकर एक बड़े राष्ट्रीय अभियान का शंखनाद हुआ है। हरिद्वार के शांतिकुंज स्थित देव संस्कृति विश्वविद्यालय (DSVV) में शनिवार को ‘दधीचि अंगदान संकल्प अभियान‘ के तहत एक भव्य राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जगत प्रकाश नड्डा (जेपी नड्डा) और विशिष्ट अतिथि के रूप में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शिरकत की. कार्यक्रम के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में उपस्थित हजारों लोगों और युवाओं ने मृत्यु के पश्चात अपने अंगों को दान करने का ऐतिहासिक सामूहिक संकल्प लिया.
शिव मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ शुरुआत
हरिद्वार पहुंचने पर केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का देव संस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पंड्या और भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने गर्मजोशी से स्वागत किया. मुख्य कार्यक्रम की शुरुआत करने से पहले जेपी नड्डा और सीएम धामी ने शांतिकुंज परिसर में स्थित प्रसिद्ध शिव मंदिर में जाकर विशेष पूजा-अर्चना की. दोनों नेताओं ने मंदिर में स्थापित ‘अखंड ज्योति’ के दर्शन कर आशीर्वाद लिया और देश तथा प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की. इसके पश्चात वे सीधे संगोष्ठी के मुख्य मंच पर पहुंचे.
जेपी नड्डा बोले: “अंगदान के दो पहलू – आध्यात्मिक और वैज्ञानिक”
संगोष्ठी को संबोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि अंगदान केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह मानव सेवा और परोपकार का सर्वोच्च कार्य है. उन्होंने अंगदान को समझने के लिए दो प्रमुख दृष्टिकोणों को सामने रखा:
- आध्यात्मिक दृष्टिकोण: भारतीय संस्कृति हमेशा से त्याग और जीव मात्र के कल्याण पर आधारित रही है. जब हम शरीर को नश्वर मानते हैं, तो मृत्यु के बाद अंगों का दान कर किसी को नया जीवन देना सबसे बड़ा पुण्य है.
- वैज्ञानिक दृष्टिकोण: आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की मदद से मृत व्यक्ति के अंगों को सुरक्षित निकालकर जरूरतमंद मरीजों तक पारदर्शी तरीके से पहुंचाना और उनका सही उपयोग सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है.
स्वास्थ्य मंत्री ने देश में अंगदान की प्रगति का विवरण देते हुए बताया कि भारत सरकार के निरंतर प्रयासों से नागरिकों में जागरूकता तेजी से बढ़ी है. उन्होंने जानकारी दी कि आधार-सत्यापित नेशनल ऑर्गन एंड टिशू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (NOTTO) पोर्टल के माध्यम से अब तक देश में 5 लाख से अधिक लोग अंगदान की डिजिटल प्रतिज्ञा ले चुके हैं. उन्होंने भरोसा दिलाया कि भारत सरकार अंगदान करने वाले जीवित दाताओं और अंग प्राप्त करने वाले मरीजों की दवाओं व पोस्ट-ट्रांसप्लांट देखभाल का पूरा खर्च उठाने के लिए प्रतिबद्ध है.
सीएम धामी ने दिया महर्षि दधीचि और राजा शिवि का उदाहरण
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में सनातन परंपरा में दान के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने पौराणिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि हम सभी महर्षि दधीचि के उस अद्वितीय त्याग से भली-भांति परिचित हैं, जिन्होंने लोक कल्याण और देवताओं की रक्षा के लिए वज्र निर्माण हेतु अपनी अस्थियों तक का दान कर दिया था. इसी तरह राजा शिवि ने एक असहाय कबूतर की जान बचाने के लिए अपने शरीर का मांस अर्पित कर दिया था.
सीएम धामी ने भावुक होते हुए कहा, “यदि हमारे निधन के बाद हमारे शरीर का कोई भी अंग किसी मरते हुए व्यक्ति को नया जीवन दे सकता है, तो इससे बड़ा कोई धर्म, परोपकार और पुण्य नहीं हो सकता”. उन्होंने देव संस्कृति विश्वविद्यालय और शांतिकुंज की सराहना करते हुए कहा कि आध्यात्मिक चेतना के साथ-साथ सामाजिक सुधार के ऐसे अभियान समाज को एक नई दिशा प्रदान करते हैं.
समाज में व्याप्त भ्रांतियों को दूर करने का संकल्प
अखिल विश्व गायत्री परिवार द्वारा संचालित इस ‘दधीचि अंगदान संकल्प अभियान‘ का मुख्य उद्देश्य समाज में अंगदान, नेत्रदान और देहदान को लेकर फैली धार्मिक व सामाजिक भ्रांतियों और अंधविश्वासों को जड़ से खत्म करना है. विशेषज्ञों के अनुसार, देश में हर साल लाखों लोग अंग न मिलने के कारण दम तोड़ देते हैं, जबकि जागरूकता की कमी से हजारों मृत शरीरों के उपयोगी अंग मिट्टी या आग में विलीन हो जाते हैं. एक अकेला अंगदाता अपने विभिन्न अंगों (जैसे किडनी, लिवर, हार्ट, लंग्स और कॉर्निया) के माध्यम से लगभग 8 लोगों को नई जिंदगी या आंखों की रोशनी दे सकता है.
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. चिन्मय पंड्या ने भी इस अवसर पर विचार रखे और कहा कि समाज के कल्याण के लिए अपने समय, श्रम और शारीरिक संसाधनों का समर्पण ही वास्तविक यज्ञ भावना है. कार्यक्रम के अंत में उपस्थित अतिथियों द्वारा अंगदान की जागरूकता से जुड़ी पठन सामग्री का विमोचन भी किया गया.