देहरादून। उत्तराखंड को विश्व की योग राजधानी और वैश्विक वेलनेस हब बनाने के सरकार के तमाम बड़े दावों के बीच एक कड़वी सच्चाई सामने आई है। राज्य में मंत्रिमंडल (कैबिनेट) से औपचारिक मंजूरी मिलने के बावजूद सैकड़ों योग प्रशिक्षित बेरोजगार युवा नौकरी के लिए तरस रहे हैं और अपनी तैनाती का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। सरकारी फाइलों और शासनादेशों के फेर में फंसी इस भर्ती प्रक्रिया के कारण योग्य युवाओं का भविष्य अधर में लटका हुआ है।
शासनादेश में संशोधन के बाद भी नहीं मिली तैनाती
उत्तराखंड सरकार द्वारा हर जिले के चुनिंदा स्कूलों में योग प्रशिक्षितों की तैनाती को लेकर प्रस्ताव तैयार किया गया था। इस संबंध में पूर्व में कैबिनेट की हरी झंडी मिलने के बाद नियमावली और शासनादेश में आवश्यक संशोधन भी किए गए। लेकिन हैरानी की बात यह है कि संशोधित शासनादेश जारी होने के बावजूद अब तक प्रदेश के हर जिले के निर्धारित स्कूलों में योग प्रशिक्षित बेरोजगारों को तैनाती नहीं दी जा सकी है। युवा लगातार शिक्षा निदेशालय और शासन के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
शिक्षा निदेशालय और सीईओ कार्यालय के बीच फुटबॉल बने युवा
बेरोजगार संगठन के पदाधिकारियों का आरोप है कि सरकारी विभाग अपनी जिम्मेदारी एक-दूसरे पर टाल रहे हैं।
- शिक्षा निदेशालय का रवैया: योग प्रशिक्षित बेरोजगार जब अपनी नियुक्ति की मांग लेकर शिक्षा निदेशालय जाते हैं, तो उन्हें मुख्य शिक्षा अधिकारी (सीईओ) कार्यालय भेज दिया जाता है।
- सीईओ कार्यालय का जवाब: जब ये युवा जिला स्तर पर मुख्य शिक्षा अधिकारी कार्यालय पहुंचते हैं, तो वहां से उन्हें दोबारा शिक्षा निदेशालय जाने का निर्देश दे दिया जाता है।
- बेरोजगारों का आक्रोश: योग शिक्षक संगठन के प्रदेश अध्यक्ष अमित नेगी का कहना है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से बेरोजगार युवाओं के भविष्य और उनकी भावनाओं के साथ एक भद्दा मजाक है। महीनों से युवा केवल विभागों के बीच फुटबॉल बने हुए हैं।
70 हजार से अधिक प्रशिक्षक वर्षों से कर रहे हैं इंतजार
उत्तराखंड में योग प्रशिक्षितों की बदहाली का यह कोई पहला मामला नहीं है। आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में लगभग 70 हजार से अधिक योग प्रशिक्षक पिछले दो दशकों (20 वर्षों) से स्थाई नियुक्तियों का इंतजार कर रहे हैं। इनमें से कई अभ्यर्थियों की निर्धारित सरकारी आयु सीमा भी समाप्त हो चुकी है और अब वे अपना जीवनयापन करने के लिए अन्य क्षेत्रों या मजदूरी जैसे कार्यों में जाने के लिए मजबूर हो रहे हैं। हालांकि सरकार ने “उत्तराखंड योग नीति 2025” को मंजूरी देकर 13,000 से अधिक रोजगार सृजित करने का दावा किया था, लेकिन जमीनी स्तर पर युवाओं को तत्काल राहत मिलती नहीं दिख रही है।
स्कूली बच्चों को भी नहीं मिल पा रही सुविधाएं
उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में केवल योग शिक्षकों की ही कमी नहीं है, बल्कि बुनियादी योजनाओं की फाइलें भी ठप पड़ी हैं। उदाहरण के तौर पर, प्रदेश के सरकारी और अशासकीय विद्यालयों के लगभग 10 लाख छात्र-छात्राओं को मिलने वाली मुफ्त कॉपियों (नोटबुक्स) का प्रस्ताव भी अटका हुआ है। अप्रैल 2025 में ही कैबिनेट ने कक्षा 1 से 12वीं तक के बच्चों को मुफ्त नोटबुक देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, लेकिन नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने के बाद भी बच्चे इसका इंतजार कर रहे हैं।
मुख्य बिंदु और वर्तमान स्थिति:
- मुख्य समस्या: कैबिनेट से नीति और पदों को मंजूरी मिलने के बाद भी योग प्रशिक्षकों को स्कूलों में नियुक्ति पत्र नहीं मिले हैं।
- विभागों की लापरवाही: शिक्षा निदेशालय और जिला सीईओ कार्यालय के बीच फाइलें घूम रही हैं।
- अमित नेगी का बयान: योग शिक्षक संगठन के अध्यक्ष ने इसे सरकार द्वारा बेरोजगारों के साथ किया जा रहा प्रशासनिक खिलवाड़ बताया।
- असर: प्रदेश के हजारों प्रशिक्षित युवाओं की सरकारी नौकरी पाने की उम्र सीमा खत्म होती जा रही है।
- दावा बनाम हकीकत: एक तरफ सरकार उत्तराखंड को वैश्विक योग हब बनाने के लिए ‘योग नीति 2025’ का प्रचार कर रही है, तो दूसरी तरफ स्थानीय प्रशिक्षित युवा बेरोजगार घूम रहे हैं।