देहरादून, 5 मई 2026:
उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने के लिए मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में निर्णय लिया गया कि चमोली जिले में स्थित वसुधारा झील (Vasudhara Tal) को एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर विकसित किया जाएगा, जहाँ राज्य का पहला हिमनद झील पूर्व चेतावनी तंत्र स्थापित होगा। 
1. वसुधारा झील ही क्यों?
समुद्र तल से लगभग 4,795 मीटर की ऊँचाई पर स्थित वसुधारा झील को विशेषज्ञों ने ‘अत्यंत खतरनाक’ (Category A) श्रेणी में रखा है। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान (WIHG) के शोध के अनुसार, 1968 से अब तक इस झील का आकार तेजी से बढ़ा है, जिससे निचले इलाकों में अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ गया है। यह प्रणाली झील के जलस्तर और हलचल पर 24×7 नजर रखेगी और किसी भी खतरे की स्थिति में समय रहते अलर्ट जारी करेगी। 
2. राज्य में नई वेधशालाओं की स्थापना:
बैठक में केवल झीलों की निगरानी ही नहीं, बल्कि व्यापक भू-वैज्ञानिक अध्ययन के लिए नई वेधशालाएं (Observatories) स्थापित करने पर भी सहमति बनी। ये वेधशालाएं:
  • ग्लेशियरों के पिघलने की दर और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का डेटा एकत्र करेंगी।
  • भूकंप और भूस्खलन जैसी घटनाओं के लिए रियल-टाइम मॉनिटरिंग करेंगी।
  • राष्ट्रीय भू-जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम के तहत अन्य 12 संवेदनशील झीलों (जैसे केदारताल और पायंगरू) के लिए आधार तैयार करेंगी। 
3. विशेषज्ञों और शासन का समन्वय:
आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने बताया कि यह पूरा प्रोजेक्ट वाडिया संस्थान और भारतीय रिमोट सेंसिंग संस्थान (IIRS) के तकनीकी सहयोग से पूरा किया जाएगा। इसके लिए केंद्र सरकार के राष्ट्रीय ग्लेशियर झील विस्फोट जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम (NGRMP) के तहत बजट और तकनीकी सहायता सुनिश्चित की गई है। 
निष्कर्ष:
2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 की रैणी आपदा से सबक लेते हुए, यह अर्ली वार्निंग सिस्टम भविष्य में जन-धन की हानि को रोकने में मील का पत्थर साबित होगा। प्रथम चरण में वसुधारा के बाद, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी की अन्य संवेदनशील झीलों पर भी ऐसे सिस्टम लगाए जाएंगे। 

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