पौड़ी गढ़वाल / देहरादून:
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बेहद गंभीर रूप ले चुका है, जिसके चलते अब नौनिहालों की शिक्षा पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है. राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले के विभिन्न क्षेत्रों में गुलदार (तेंदुए) के बढ़ते आतंक और लगातार सक्रियता को देखते हुए शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन ने बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर बड़ा कदम उठाया है. वन विभाग और स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर जिले के प्रभावित संकुलों के कई विद्यालयों में एहतियातन अवकाश घोषित कर दिया गया है, ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बच्चों को बचाया जा सके.
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बेहद गंभीर रूप ले चुका है, जिसके चलते अब नौनिहालों की शिक्षा पर भी इसका सीधा असर पड़ रहा है. राज्य के पौड़ी गढ़वाल जिले के विभिन्न क्षेत्रों में गुलदार (तेंदुए) के बढ़ते आतंक और लगातार सक्रियता को देखते हुए शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन ने बच्चों की सुरक्षा के मद्देनजर बड़ा कदम उठाया है. वन विभाग और स्थानीय प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर जिले के प्रभावित संकुलों के कई विद्यालयों में एहतियातन अवकाश घोषित कर दिया गया है, ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बच्चों को बचाया जा सके.
हाल ही में पौड़ी जिले के एकेश्वर विकासखंड के अंतर्गत आने वाले राजकीय प्राथमिक विद्यालय सासौं में उस समय भारी अफरा-तफरी मच गई, जब सुबह की प्रार्थना सभा चल रही थी. स्कूल परिसर की चारदीवारी के ठीक पास अचानक दो गुलदार आकर खड़े हो गए. प्रार्थना कर रहे बच्चों और शिक्षकों की नजर जैसे ही इन गुलदारों पर पड़ी, पूरे परिसर में चीख-पुकार और दहशत का माहौल बन गया. इसी दौरान वहां से गुजर रहे एक स्थानीय टैक्सी चालक ने सूझबूझ दिखाते हुए लगातार गाड़ी का हॉर्न बजाया और शोर मचाया. ग्रामीणों के इकट्ठा होने और शोर-शराबा बढ़ने के बाद दोनों गुलदार वापस घने जंगल की ओर भाग गए. इस रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना के तुरंत बाद उप शिक्षा अधिकारी ने सुरक्षा के लिहाज से स्कूल को बंद करने का आदेश जारी किया.
शिक्षा विभाग का बड़ा फैसला: प्रभावित क्षेत्रों में ऑनलाइन पढ़ाई
गुलदार की इस बढ़ती धमक और ग्रामीणों के भारी विरोध को देखते हुए मुख्य शिक्षा अधिकारी (CEO) और जिला प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि बच्चों की जान जोखिम में डालकर स्कूल संचालित नहीं किए जाएंगे. प्रशासन द्वारा उठाए गए मुख्य कदम और पाबंदियां इस प्रकार हैं:
- स्कूलों में क्रमिक बंदी: एकेश्वर ब्लॉक के सासौं प्राथमिक विद्यालय समेत आसपास के संवेदनशील ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों को अस्थायी रूप से बंद रखा गया है. इससे पहले भी पौड़ी के पोखड़ा, बीरोंखाल, बाड़ा और चरधार संकुलों में गुलदार के हमलों और मूवमेंट के कारण 10 से लेकर 30-30 स्कूलों को कई दिनों तक बंद रखना पड़ा था.
- ऑनलाइन शिक्षा का सहारा: जिन क्षेत्रों में गुलदार आदमखोर हो चुके हैं या आबादी के बेहद करीब देखे जा रहे हैं, वहां बच्चों की पढ़ाई का नुकसान रोकने के लिए ऑनलाइन कक्षाओं (Online Classes) का संचालन किया जा रहा है.
- अभिभावकों को सख्त हिदायत: शिक्षा विभाग ने स्कूल प्रबंधन समितियों (SMC) को निर्देश दिए हैं कि वे अभिभावकों के साथ बैठक करें. बच्चों को किसी भी हाल में अकेले सुनसान रास्तों या जंगलों की तरफ न जाने दिया जाए.
- स्कूल आने पर लिखित अनुबंध: उत्तरकाशी और पौड़ी के कुछ प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासन ने यह भी नियम बनाया था कि यदि आपातकालीन स्थिति में छात्र स्कूल आना चाहते हैं, तो अभिभावकों की पूरी सुरक्षा जिम्मेदारी और लिखित सहमति अनिवार्य होगी.
एक्शन में वन विभाग: पिंजरे और थर्मल कैमरों से निगरानी
गुलदार के इस खौफ को कम करने और ग्रामीणों को सुरक्षित माहौल देने के लिए गढ़वाल वन प्रभाग की टीमें लगातार धरातल पर गश्त कर रही हैं. वन विभाग द्वारा प्रभावित गांवों में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए जा रहे हैं:
- ट्रैपिंग कैमरों की तैनाती: गुलदार के मूवमेंट और उसके रास्तों को ट्रैक करने के लिए स्कूलों और रिहायशी इलाकों के आसपास ट्रैप कैमरे (Trap Cameras) लगाए गए हैं.
- पिंजरे लगाने की तैयारी: दमदेवल और नागदेव रेंज की टीमों ने प्रभावित गांवों का दौरा कर ग्रामीणों से इनपुट लिए हैं. वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, जिन जगहों पर गुलदार लगातार आबादी में घुस रहे हैं, वहां उन्हें पकड़ने के लिए लोहे के पिंजरे लगाए जा रहे हैं.
- झाड़ियों का कटान: वन विभाग ने स्थानीय प्रशासन के सहयोग से स्कूलों के रास्तों और परिसर के चारों तरफ उगी लंबी झाड़ियों को काटने का काम शुरू किया है, ताकि गुलदार को छिपने की जगह न मिल सके.
- नाइट पेट्रोलिंग (रात की गश्त): पहाड़ी गांवों में शाम ढलते ही सन्नाटा पसर जाता है और लोग घरों में कैद होने को मजबूर हैं. इसे देखते हुए वन कर्मियों की टीमें रात के समय हूटर और लाइटों के साथ लगातार गश्त कर रही हैं.
उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जंगली जानवरों का यह आतंक अब एक बड़ी सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती बन चुका है, जिससे आम जनजीवन और बच्चों का भविष्य बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.